गुजरात के मोरबी शहर का पूर्वी इलाका—घुंटू रोड, हलवद रोड, जांबुड़िया रोड, लाल परी रोड और नेशनल हाईवे 27—आमतौर पर चौबीसों घंटे धुएं, धूल और ट्रकों की आवाजाही से गुलज़ार रहता था। यहां सिरेमिक उद्योग से जुड़े सैकड़ों कारखाने दिन-रात और साल के 365 दिन लगातार चलते थे।
इन फैक्ट्रियों की किल्न (भट्टियों) और स्प्रे-ड्रायर से निकलने वाला सफेद और काला धुआं दूर-दूर तक दिखाई देता था, जो इस इलाके की औद्योगिक रफ्तार का प्रतीक माना जाता था। राजस्थान और कच्छ से लाई गई मिट्टी को केमिकल्स के साथ मिलाकर लगभग 1200 डिग्री तापमान पर पकाया जाता था और उससे चमकदार सिरेमिक टाइलें तैयार की जाती थीं। ये टाइलें देशभर के साथ-साथ विदेशों में भी निर्यात की जाती थीं।
लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं। इन दिनों मोरबी की फैक्ट्रियों की चिमनियां तो खड़ी हैं, लेकिन उनमें से धुआं निकलना बंद हो गया है। सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है और हजारों ट्रक या तो किनारे खड़े हैं या फिर दूसरे शहरों की ओर रुख कर चुके हैं।
औद्योगिक गतिविधियों में आई इस अचानक गिरावट ने स्थानीय अर्थव्यवस्था, मजदूरों और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर गहरा असर डाला है। मोरबी, जिसे देश की सिरेमिक राजधानी कहा जाता है, इस समय एक असामान्य ठहराव का सामना कर रहा है।